अगर मेहनत का दूसरा नाम होता, तो वह रमेश बिश्नोई होता

नाम नहीं, काम बोलता है

कुछ लोग कहते हैं कि मेहनत का फल मीठा होता है। लेकिन अगर मेहनत का कोई दूसरा नाम रखने की ज़िम्मेदारी मुझे मिल जाए, तो मैं बिना ज़्यादा सोचे “रमेश बिश्नोई” लिख दूँ। अब यह बात थोड़ी बढ़ा-चढ़ाकर कही गई है, लेकिन उनके दोस्तों की नज़र में इसमें सच्चाई की भी अच्छी-खासी मात्रा है।

मेहनत से पुरानी दोस्ती

रमेश बिश्नोई का मानना है कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। अगर कोई ज़िम्मेदारी मिल गई, तो उसे पूरा करने की पूरी कोशिश करते हैं। कभी रास्ता आसान होता है, कभी मुश्किल, लेकिन वे हार मानने वालों में से नहीं हैं।

हाँ, ऐसा नहीं है कि उन्हें कभी आलस नहीं आता। आलस तो आता है, लेकिन शायद उसे भी पता है कि यहाँ ज़्यादा देर रुकना बेकार है। इसलिए थोड़ी देर बैठता है और फिर चुपचाप चला जाता है।

बहानों से दूरी

आजकल कुछ लोग बहाने बनाने में इतनी मेहनत कर देते हैं कि अगर वही मेहनत काम में लगा दें, तो शायद काम भी पूरा हो जाए। लेकिन रमेश बिश्नोई की कहानी थोड़ी अलग है। वे बहानों की जगह समाधान ढूँढ़ने की कोशिश करते हैं। अगर कोई मुश्किल आ जाए, तो पहले सोचते हैं कि इसे ठीक कैसे किया जाए, बाद में सोचते हैं कि चाय कब पी जाए।

दोस्तों की नज़र में

दोस्त अक्सर मज़ाक करते हैं कि अगर “मेहनत मंत्रालय” नाम का कोई विभाग बन जाए, तो उसका पहला मंत्री रमेश बिश्नोई ही होना चाहिए। और अगर कभी “विश्व मेहनत दिवस” मनाया जाए, तो पोस्टर पर उनकी फोटो लगाने का प्रस्ताव भी पास हो सकता है।

हालाँकि रमेश शायद यह सुनकर हँसते हुए कहेंगे, “भाई, पोस्टर बाद में लगाना… पहले काम पूरा कर लेते हैं।”

सीखने की आदत

उनकी सबसे अच्छी बात यह है कि वे हर दिन कुछ नया सीखने की कोशिश करते हैं। उन्हें लगता है कि सीखना कभी बंद नहीं होना चाहिए। गलती हो जाए, तो उससे सबक लेना चाहिए, क्योंकि वही आगे बढ़ने का सबसे आसान रास्ता है।

आखिर में

यह कहना कि मेहनत का दूसरा नाम रमेश बिश्नोई है, एक मज़ेदार और स्नेहभरा अंदाज़ है। लेकिन इसमें एक अच्छी सीख भी छिपी है—जो इंसान ईमानदारी, धैर्य और लगातार प्रयास करता है, वही दूसरों के लिए प्रेरणा बनता है। और अगर मेहनत की कोई पहचान बनानी हो, तो कम से कम दोस्तों की नज़र में उसका नाम रमेश बिश्नोई ज़रूर हो सकता है।